About KULDEEP NISHAD

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दर्द ए आज़मगढ़

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आजमगढ़ : इतिहास और संस्कृति

महामुनि अत्रि और सतीत्व की प्रतीक उनकी पत्नी अनुसूया के तीनों पुत्रों महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय और महर्षि चन्द्र की कर्मभूमि का गौरव प्राप्त करने वाला क्षेत्र आजमगढ़ आज अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता के बीच संघर्ष करता दिख रहा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से पावन तमसा के प्रवाह से पवित्र आजमगढ़ न जाने कितने पौराणिक, मिथकीय, प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सौन्दर्य को छिपाए अपने अतीत का अवलोकन करता प्रतीत हो रहा है। आजमगढ़ को अपनी आज की स्थिति पर गहरा क्षोभ और दुख जरूर हो रहा होगा कि जिस गरिमा और सौष्ठव से उसकी पहचान थी, वह अतीत में कहीं खो गयी है और चंद धार्मिक उन्मादी और बर्बर उसकी पहचान बनते जा रहे हैं। आजमगढ़ ने तो कभी सोचा भी न होगा कि उसे महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, वाल्मीकि, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी, कैफी आजमी और श्यामनारायण पांडेय के बजाय बटला हाउस, आतंकवाद, जातिवादी राजनीति और अपराध से जाना जाएगा।

post credit : Harishankar Radhi

 

DURVASA: AN ANCIENT RELIGIOUS SPOT

आजमगढ़ और महर्षि दुर्वासा

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महर्षि दुर्बासा का नाम तो लगभग हर भारतीय जनता हैं. और कुछ को उनकी कहानिया भी पता हैं. लेकिन इस महर्षि कि तपो भूमि कंहा हैं बहुत ही कम लोगो को पता हैं.
 
आजमगढ़ मुख्यालय से ४० किलोमीटर कि दुरी पर बसा हैं एक छोटा सा गाँव. जिसका नाम हैं दुर्वासा . तहसील और ब्लोंक फूलपुर हैं. फूलपुर से दुर्वासा कि दुरी लगभग ७ किलोमीटर हैं. ये वोही फूलपुर(फूलपुर क़स्बा अलग हैं, और तहसील और ब्लाक अलग हैं . जबकि फूलपुर रेलवे स्टेशन को खुरासान रोड के नाम से जाना जाता हैं.) जंहा के कैफ़ी आज़मी (कैफ़ी आज़मी जी के गाँव का नाम मेजवा हैं, जो कि खुरासान रोड [फूलपुर से ३ किलोमीटर कि दुरी पर हैं.]) साहेब और उनकी बेटी शबाना आज़मी जी हैं.
 
 
दुर्वासा गाँव टौंस और मझुई नदी के संगम पर बसा हैं. एक तरफ भगवान शिव का मंदिर जिनको रिख्मुनी के नाम से स्थानीय लोग पुकारते हैं, तो नदी के पार महर्षि दुर्बासा जी का मंदिर या कह ले कि आश्रम. इस आश्रम में दुर्बासा जी तपस्या करते थे.
 
 
सप्त ऋषियों में से तीन ऋषियों कि तपो भूमि रही हैं ये जगह. और उसका उदहारण हैं टौंस नदी के किनारे तीन ऋषियों के आश्रम.
 
 
कार्तिक पूर्णिमा के दिन बहुत ही विशाल मेला लगता हैं. और बहुत ही दूर – दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. कार्तिक पूर्णिमा के दिन लगने वाला मेला पुरे तीन दिन तक चलता हैं.

ऋषि अत्री और सती अनसुइया के पुत्र महर्षि दुर्वासा कि अपनी अलग ही पहचान थी. और ये अपने श्राप और क्रोध के लिए ज्यादे जाने जाते हैं.

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 उत्तर प्रदेश कि सरकार ने इस तीर्थ स्थल पर ध्यान न के बराबर दिया हैं. जिसकी वजह से ये तीर्थ स्थल लोगो कि जानकारी से बहुत दूर हैं.

post credit: Tarkeshwar Giri (https://bit.ly/2I63zCK)